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प्लास्टिक हटाओ जीवन बचाओ...

शुरुआत, बोतल में बंद मिनरल वाटर से करते है| आज मिनरल वाटर पीना लोगों की दिनचर्या में शामिल है पर क्या आप जानते है जिस पानी को मिनरल वाटर कहकर लोग पानी पीते है उस पानी में प्रति लीटर 325 सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते है| फ्रेडोनिया यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयोर्क के वैज्ञानिक अध्ययन में ये बात सामने आई है| ये अध्ययन 9 देशों में किया गया जिसमे 259 बोतलों पर अध्ययन के बाद ये बात सामने आई है| आपको जानकर हैरानी होगी कि, विश्व भर में पानी के साथ लोग प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पीने को मजबूर है| क्योंकि ये पानी घर के नलों में से आता है| जानकारों द्वारा मिली, साल 2017 की रिपोर्ट के अनुसार 5 महाद्वीपों में से 12 देशों के पानी के नमूने जिस वक्त लिए गए तो तकरीबन 83% पानी के नमूनों ने प्लास्टिक के कण मौजूद मिले| पर इस प्लास्टिक प्रदूषण के लिए हम ही लोग जिम्मेदार है, जिस कारण प्लास्टिक हमारे शरीरों तक प्रवेश कर चूका है| प्रतिदिन समुन्द्र में प्लास्टिक का इस्तेमाल इसी प्रकार करते रहे तो साल 2050 तक मछलियों से कही ज्यादा प्लास्टिक कचरा समुंद्र में नजर आएगा| इसे यदि अभी नहीं रोका गया तो आने वाले समय में परिणाम अति विनाशकारी होंगे| अब इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते है कि 267 तरह तरह की प्रजातियां, (जीव-जंतु ) प्लास्टिक खा रही है उन्हें तो समझ नहीं है पर हम तो प्लास्टिक के दुष्परिणामों से अवगत है| इसीलिए नीदरलैंड ने अपने देश के सभी समुद्रों की सफाई करवानी शुरू कर दी है| आयरलैंड में साल 2002 में प्लास्टिक बैग पर टैक्स लगाया गया और सख्त निर्देश दिए गये कि यदि प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल किया तो टैक्स काफी ज्यादा देना होगा इस योजना के चलते आयरलैंड में 94% प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल में गिरावट दर्ज की गयी| प्लास्टिक के इस्तेमाल में भारत 5वा बड़ा उपभोक्ता देश है| अमेरिका में हर साल एक औसत व्यक्ति 109 किग्रा. प्लास्टिक का प्रयोग करता है| देश में प्लास्टिक कानून की बात की जाएं तो दुकानदार केवल 50 माइक्रोन से काम वाला प्लास्टिक प्रयोग में नहीं ला सकते है यानि ये दूसरे प्रकार के प्लास्टिक बैग पर लागू होता ही नहीं         
है जो बाजार में अभी भी उपलब्ध है| मोटा माइक्रोन प्लास्टिक बैग बाजार में उपलब्ध है मतलब ये कि इससे प्लास्टिक पर कोई खास रोकथाम नहीं होती है| आवश्यक्ता अविष्कार कि जननी है तो इसी के मद्देनजर अमेरिका और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने पीईटी नाम का एक एंजाइम बनाया है पॉलीइथाइलीन 
टेरेपथेलेट प्लास्टिक में परिवर्तन करके उसे उसके मूल घटक में आता है जिससे प्लास्टिक की बोतलों को ( जो यूज की नहीं रही है ) दुबारा से परिवर्तित करके ( रिसाइकिलमेंट ) नई व उच्चगुणवत्ता वाली बोतलें तैयार हो सकेगी| इसी से प्लास्टिक के उत्पादन में बड़ी मात्रा में कमी आएगी| जनता का मानना है कि प्लास्टिक पर पूर्णरूप से रोक लगनी चाहिए जनमत के सर्वे के अनुसार 85% जनता प्लास्टिक पर रोक चाहती है और 94% जनता दिनचर्या में प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से खासा चिंतित है| पर कदम जनता को ही उठाना होगा| देश का काफी हिस्सा प्लास्टिक के द्वारा होने वाली परेशानियो व हानियों से अनभिज्ञ है| अतः जो इसके उपयोग व दुरूपयोग के विषय में सविस्तार जानकारी रखते है उन्हें दुसरो को ( इससे होने वाली हानियों के विषय में ) जागरूक करना चाहिए और हर एक को स्वम इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए ताकी भविष्य सुरक्षित बना रहे| प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल से जो खतरे होते है उसके प्रति आगाह करने के लिए 22 अप्रैल को 'पृथ्वी दिवस' घोषित किया गया और इस वर्ष इसकी थीम रखी गयी " प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करो ".
 
                                                      निधि भड़ाना 

कांग्रेस का आत्मघाती कदम

पिछले कई दिनों से पूरे देश में इस बात की जोर-शोर से चर्चा हो रही थी कि कुछ विपक्षी दलों ने कांग्रेस की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का जो नोटिस राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को दिया है, इस नोटिस का क्या अंजाम होता है? यह बात तो शुरू से साफ थी कि यह एक तरह से अधकचरी और बचकाना हरकत है। राज्यसभा के 64 सदस्यों ने इस महाभियोग प्रस्ताव पर दस्तखत किए थे। परन्तु इसके पारित होने के लिये राज्यसभा के दो-तिहाई सदस्यों की सहमति जरूरी थी। विपक्षी दलों को राज्यसभा में इतना बहुमत प्राप्त नहीं था और मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग को लोकसभा में पारित करना तो असंभव ही था। इस तरह से यह स्पष्ट हो गया था कि हड़बड़ी में लाया गया महाभियोग का प्रस्ताव किसी भी हालत में सफल नहीं होगा। सबसे दिलचस्प बात तो यह थी कि कांग्रेस ने महाभियोग लाने का फैसला किया था, परन्तु उसके दो वरिष्ठ सदस्य पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस प्रस्ताव पर दस्तखत करने से साफ इंकार कर दिया था। इतना ही नहीं कांग्रेसी नेता और  पूर्व कानून मंत्री अश्वनी कुमार और सलमान खुर्शीद भी इसके विरोध में थे, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि इसका परिणाम क्या होने वाला है। इसलिए वे किसी भी हालत में अपनी किरकिरी नहीं करवाना चाहते थे। इसके बावजूद कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी ने पार्टी के कुछ सांसदों की सलाह पर इस प्रस्ताव को पेष करवाने का निर्णय लिया। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस प्रस्ताव को खारिज करने से पहले देश के नामी-गिरामी न्यायविदों से सलाह मशविरा किया और सभी ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि यह प्रस्ताव बिलकुल बेमानी है और राजनीतिक स्वार्थ के कारण महज सस्ते प्रचार के लिए लाया गया है। ने न्यायविदों के अलावा पूर्व एटार्नी जनरलों और संविधान विशेषज्ञों के विचारों को भी पढ़ा। फिर वे इस नतीजे पर पहुंचे कि इस प्रस्ताव को खारिज करने अलावा और कोई चारा नहीं है। जिस दिन यह महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति को सौंपा गया उसी दिन से मीडिया में प्रमुख संविधान विशेषज्ञों की राय आनी शुरू हो गई। संविधान और कानून के विशेषज्ञों ने राय जाहिर की कि यह एकदम बेमानी है, अधकचरा और बचकाना हरकत है जिसका कोई मतलब नहीं। पूर्व एटार्नी जनरल सोली सारोबजी ने कहा कि सभापति वेंकैया नायडू ने गुण-दोष के आधार पर इस नोटिस को नामंजूर कर दिया है और फैसला लेने के पहले कानूनविदों से विस्तारपूर्वक विचार विमर्श किया है। अतः उनका निर्णय शत-प्रतिशत उचित है। उसी तरह प्रसिद्व विधिवेता फली एस नरिमन ने कहा कि राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने जो फैसला लिया है वह सर्वथा उचित है। संविधान के अनुसार इस विषय में फैसला लेने का अधिकार उन्हीं हो है और उनकी राय में वेंकैया नायडू ने सही निर्णय लिया जब से महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को भेजा गया टीवी के विभिन्न चैनलों पर बहस जारी थी और अनेक संविधान विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि यह स्वार्थ में उठाया गया कदम है और इस प्रस्ताव को उपराष्ट्पति को तुरन्त खारिज कर देना चाहिए। अंत में हुआ भी यही। उपराष्ट्रपति ने गहन विचार विमर्श के बाद और आरोप के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह फैसला किया कि महाभियोग का आरोप पूर्णतः निराधार और असंवैधानिक हैं। अतः उसे खारिज ही कर देना चिहए। उपराष्ट्रपति के इस निर्णय की देश के सभी संविधान विशेषज्ञों ने सराहना की और यह भी कहा कि भविष्य मे ंकिसी भी राजनीतिक दल को ऐसा नहीं करना चिहए। क्योंकि इससे न केवल देश के सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा पर आंच पहुंचती है बल्कि इससे पूरे देश की छवि विदेशों में धूमिल होती है। सच कहा जाए तो विपक्षी दलों ने चीफ जस्टिस  के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव का नोटिस लाकर अपनी पूरी तरह किरकिरी करा ली है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इतनी किरकिरी होने के बावजूद कांग्रेस सुप्रीमो इससे कोई सबक नहीं ले रहे हैं। उल्टे अपनी और किरकिरी कराने में तुले हैं।  हालात यह है कि 
अब उपराष्ट्रपति  द्वारा प्रस्ताव खारिज किए जाने से बौखलाए कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाएंगे। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट भी इस तरह के प्रस्ताव को तुरन्त खारिज कर देगा। प्रसिद्व कानूनविद रामजेठमलानी ने कहा है कि यह पूर्णतः बचकानी हरकत थी और ऐसे प्रस्ताव को शुरू में ही कूड़ेदान में डाल देना चाहिए था। कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि महज ओछी पब्लिसिटी के लिये कांग्रेस समेत कुछ राजनीतिक दलों ने फालतू में अपना बेड़ा ही गर्क कर लिया। इसे कांग्रेस का आत्मघाती कदम ही कहा जाएगा कि देश का मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद आज उसके गिने-चुने सांसद हैं। इसके बावजूद उसके नेता बचकानी हरकतें करके पार्टी की रही-सही छवि भी मिटाने में तुले हुए हैं।
                                                                                                                                                 -राजेश अवस्थी

सजा के साथ-साथ समाज की मानसिकता भी बदलें

देश में दुष्कर्म की बढ़ती हुई घटनाओं के विरोध में केंद्र सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मासूम बच्चियों से दुष्कर्म के आरोपियों को जांच में दोषी पाए जाने पर सजा-ए-मौत देने का कानून बना दिया हैं। यदि देखा जाए तो सरकार ने इस मामले में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है कि वह दुष्कर्मियों को कठोर से कठोर दण्ड दिलवाने में कतई हिचकेगी नहीं, लेकिन इसके बाद भी बड़ा सवाल उठता है कि क्या सरकार के कानून बना देने से दुष्कर्म की घटनाओं में कमी आएगी? यह सवाल इसलिए कि पहले भी इस देश में कई अपराधों के गुनहगारों को सजा दिलवाने के लिए अनेक कानून बने, उसके बावजूद अपराधों में कमी आने के बजाय उनमें वृद्धि ही हो रही है। 
सवाल उठता है कि अपनी संस्कृति एवं मर्यादा के लिए विश्व भर में अपनी पहचान कायम करने वाले भारत में दुष्कर्म जैसे घृणित अपराध की प्रवृत्ति को इतना बढ़ावा कैसे मिला? वे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से समाज ऐसे गुनाह की तरफ अग्रसर हो रहा है। अगर इस सम्बंध में गम्भीरता से मंथन किया जाए तो पता चलेगा कि बढता इंटरनेट का प्रयोग, अश्लील वेबसाइटों का प्रचलन भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। वर्तमान में हर हाथ में स्मार्ट फोन होने से पोर्न साइटों को देखने का प्रतिशत भी बढ़ा है। इसी तरह राजनीति का अपराधीकरण भी समाज में इस तरह के गुनाह को प्रोत्साहित करने के लिए जिम्मेदार है। कहते हैं कि सात्विकता ही संस्कारित विचारों को जन्म देती है जो कि सात्विक कर्म और सात्विक खान-पान से ही आ सकती है। इसके विपरीत आज समाज में हर तरपफ बेईमानी का बोलबाला है। अपना स्टेटस हाई  रखने के लिए लोग पैसा कमाने की होड़ में लगे हुए हैं, चाहे उसके लिए कितने ही बुरे कर्म क्यों न करने पड़ें। बुरे कर्मों से कमाए गए धन से परिवार का पालन पोषण करने के बाद उनसे संस्कारों की उम्मीद करना बेमानी है। परिणाम यह है कि आज समाज में मर्यादाओं का क्षरण हो रहा है। संस्कार मिटते जा रहे हैं और यही कारण है कि दुष्कर्म की घटनाओं में भी बढ़ोत्तरी हो रही है, जोकि पूरे समाज के लिए घातक है।
सरकार ने तो दुष्कर्मियों को कठोर से कठोर दण्ड देने के लिए कानून बना दिया। याद करें कुछ वर्षों पहले दिल्ली में निर्भया काण्ड हुआ था। उसके बाद सरकार ने पास्को एक्ट लागू करके सख्त कानून बनाया था, इसके बावजूद दुष्कर्म की घटनाओं में कमी आने के बजाय वृद्धि होती गई। उधर इस तरह की घटनाओं पर राजनीतिक दलों के नेता गंदी राजनीति करने से बाज नहीं आते। इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए सभी दलों के नेता आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति छोड़कर आपस में मिल-बैठकर विचार विमर्श कर गम्भीरता से मंथन करें तथा समाज में ऐसा सकारात्मक वातावरण बनाएं कि लोगों की दूषित मानसिकता बदले। इसके लिए जरूरी है कि इस तरह के अपराधों को बढ़चढ़कर दिखाने के बजाय समाज के अच्छे कामों को प्रचारित करें तथा लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करें। इसके साथ ही शासन व प्रशासन में बैठे लोगों को भी चाहिए कि वे कानूनों का दुरुपयोग न हो, उनका ठीक से पालन हो, इस पर नजर रखें, क्योंकि जब तक कानून का सही इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, गुनहगार इसी तरह समाज को खोखला करते रहेंगे।   
                                                                         
                                                                                       -राजेश अवस्थी        

मासूमों से दुष्कर्म करने वालों को फांसी की सजा का प्रावधान

कठुआ में मासूम बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस घटना के बाद देश भर से एक स्वर से उठी आवाज के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिए आखिर मासूमों से दुष्कर्म करने वालों को सजा-ए-मौत का कानून लागू करने  का फैसला कर लिया। 12 वर्ष से कम उम्र की बच्ची से दुष्कर्म के आरोपियों को दोषी पाए जाने पर सजा-ए-मौत समेत सख्त दण्ड दिए जाने सम्बंधी अध्यादेश को रविवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दे दी। इससे पूर्व शनिवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इस अध्यादेश को स्वीकृति दी गई, जिसमें 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के आरोपी को दोषी पाए जाने पर  अदालत को मृत्युदण्ड देने की अनुमति दी गई है।
अब आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2018 के अनुसार ऐसे मामलों से निपटने के लिए नई त्वरित अदालतें गठित की जाएंगी और सभी पुलिस थानों एवं अस्पतालों को दुष्कर्म मामलों की जांच के लिए विशेष फॉरेंसिक किट उपलब्ध कराई जाएगी। इसमें 16 एवं 12 साल से कम उम्र की लड़कियों से दुष्कर्म के मामलों में दोषियों के लिए सख्त सजा की अनुमति है। बारह साल से कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म के दोषियों को मौत की सजा देने की बात इस अध्यादेश में कही गई है। महिलाओं से दुष्कर्म मामले में न्यूनतम सजा सात साल से 10 साल सश्रम कारावास की गई जो अपराध की प्रवृत्ति को देखते हुए उम्रकैद तक भी बढ़ाया जा सकता है। 16 साल से कम उम्र की लड़कियों से सामूहिक दुष्कर्म के दोषी के लिए उम्रकैद की सजा का प्रावधान बरकरार रहेगा। 16 साल से कम उम्र की लड़कियों के दुष्कर्म मामले में न्यूनतम सजा 10 साल से बढ़ाकर 20 साल की गई और अपराध की प्रवृत्ति के आधार पर इसे बढ़ाकर जीवनपर्यंत कारावास की सजा भी किया जा सकता है। यानी दोषी को मृत्यु होने तक जेल की सजा काटनी होगी। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), साक्ष्य अधिनियम, आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और यौन अपराधों से बाल सुरक्षा (पोक्सो) अधिनियम को अब संशोधित माना जाएगा। इस अध्यादेश में मामले की त्वरित जांच एवं सुनवाई की भी व्यवस्था है अधिकारियों ने बताया कि बलात्कार के सभी मामलों में सुनवाई पूरी करने की समय सीमा दो माह होगी। साथ ही 16 साल से कम उम्र की लड़कियों से दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म के आरोपी व्यक्ति को अंतरिम जमानत नहीं मिल सकेगी।
 दरअसल भारत दुनिया के ऐसे देशों में शामिल है, जहां बालिकाओं के साथ भी दुष्कर्म की घटनाएं बहुत ज्यादा होती हैं और ऐसा नहीं है कि यह शर्मनाक वारदातें कोई दो चार साल में ही बढ़ी हों, काफी लम्बे वक्त से यह घिनौनी घटनाएं जारी हैं। दूर-दराज के इलाकों में होने के चलते अधिकांश घटनाओं की चर्चा ही नहीं हो पाती। बहुत सी वारदातों को इसलिए कानून के दायरे तक नहीं पहुंचने दिया जाता, क्योंकि उनमें कोई नजदीकी ही शामिल होता है अथवा कई बार लोभ लालच देकर पीड़ित परिवार का मुंह बंद कर दिया जाता है। वर्तमान में दुष्कर्म की घटनाओं में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। राजनीति के अपराधीकरण ने इस गुनाह को और अधिक बढ़ावा दिया है। ऐसी अवस्था में दुष्कर्म के खिलाफ कड़े से कड़े दण्ड का प्रावधान करने की सख्त जरूरत थी।
दुष्कर्म ऐसा जघन्य अपराध है, जो किसी मासूम के शरीर पर ही नहीं, मन मस्तिष्क पर भी बहुत गहरा असर छोड़ जाता है। चूंकि घटना किसी बालिका अथवा बालिग युवती के साथ होती है, इसलिए अक्सर समाज इसे दूसरा मोड़ देकर लड़की और उसके परिवार के साथ गलत व्यवहार करने लगता है, जबकि होना चाहिए इसके उलट। जिसने बलात्कार जैसी घिनौनी घटना को अंजाम दिया है, ऐसे व्यक्ति अथवा उसका बचाव करने वाले लोगों को शर्मिंदा किया जाना चाहिए ताकि आगे से बाकी लोगों को सबक मिले और वह ऐसी हरकतें करने से पहले सौ बार सोचें। होता यह है कि एक तो थानों पर इस अपराध की रिपोर्ट ही नहीं दर्ज होती और अगर रिपोर्ट दर्ज हो भी गई तो पीड़िता व उसके परिवार वालों को पुलिस से लेकर अदालत की चौखट तक ऐसे चुभते सवालों का सामना करना पड़ता है कि एक बार फिर पीड़िता की इज्जत सरे बाजार तार-तार हो जाती है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने दुष्कर्म के खिलाफ सख्त कानून बनाकर उचित ही किया है, लेकिन इसके साथ ही यह  भी देखना होगा कि अदालतों में इस कानून का सही ढंग से पालन हो तथा जांच तथा पूछताछ के नाम पर पुलिस कार्यवाही से लेकर अदालत की चौखट के तक दुष्कर्म पीड़िता की इज्जत के साथ खिलवाड़ न हो। 
                                                                               
                                                                                                  -राजेश अवस्थी

न्यायपालिका को सियासत का अखाड़ा बनाने से बाज आएं

पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में आरोपों-प्रत्यारोपों के साथ-साथ अपने विपक्षी दलों के प्रति नफरत का जो बीजारोपण किया जा रहा है, उससे स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था को गहरा आघात लगा है। हालात यह है कि देश को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए विचार विमर्श और परिचर्चा के सबसे बडे़ मंच संसद की गरिमा को भी इन राजनीतिज्ञों ने आए दिन हंगामा व बवाल करके तार-तार कर दिया है।  
हद तो तब हो गई कि इन राजनीतिज्ञों ने कार्यपालिका के साथ-साथ न्यायपालिका को भी अपनी सियासत का अखाड़ा बना लिया है। इसका एक उदाहरण सुप्रीम कोर्ट मे शुक्रवार को  सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में सुनवाई करने वाले सीबीआई के विशेष जज बीएच लोया की मौत की एसआईटी से स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी से मिलता है। 
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की याचिकाएं दायर करने वालों की मानसिकता और मंतव्य को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि यह राजनीतिक जंग को न्यायपालिका तक लाने जैसा है और इस केस में कोई दम ही नहीं है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि जज बीएच लोया की मौत प्राकृतिक थी। इस मामले में चार जजों ने जो बयान दिए हैं, उन पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जज लोया की मौत को लेकर जो भी याचिकाएं दायर की गई हैं, उनके जरिए न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की गई है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर खुला प्रहार करने की कोशिश की गई है। इसके बहाने न्यायपालिका को राजनीतिक जंग में घसीटा गया। जनहित याचिका न केवल राजनीति से प्रेरित हैं बल्कि राजनीतिक दुश्मनी निकालने के लिए दाखिल की गई हैं। पीठ ने इन याचिकाओं से जुड़े वकीलों के रवैये के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं और उनके वकीलों को न्यायपालिका की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए था, लेकिन इन लोगों ने उसको तार-तार कर दिया। विशेष बात यह है कि पीठ ने चेतावनी देते हुए बताया कि हमने सोचा था कि अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए लेकिन वह फिलहाल ऐसा नही कर रहे हैं। इन जनहित याचिकाओं में सच्चाई नहीं है। अदालत राजनीतिक दुश्मनी निकालने की जगह नहीं है। उसकी सही जगह चुनाव है। शीर्ष अदालत ने यहां तक कहा कि पीआईएल राजनीतिक स्वार्थ साधने और बदले की राजनीति का उपकरण बन गई हैं। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि लोया केस जब अदालत के सामने पेश किया गया तो एक मैगजीन और अखबार में न्यायपालिका की छवि को खराब करने वाली प्रायोजित रिपोर्ट्स छापी गई थीं।
राजनीतिक दलों के इस रवैये से जहां  आम जनता के मन में कार्यपालिका के साथ-साथ न्यायपालिका के प्रति भी विश्वसनीयता का संकट उपजता है, वहीं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर छवि धूमिल होती है।
                                                                                            - राजेश अवस्थी