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बैंकिंग प्रणाली पर सवालिया निशान

पिछले दिनों किंग फिशर एयरलाइंस प्रकरण मे अरबों रुपये का बैंक घोटाला सामने आने  के बाद अब पंजाब नेशनल बैंक को एक हीरा कारोबारी द्वारा 11,330 करोड़ रुपये का चूना लगाये जाने का मामला सामने आने से पूरी बैंकिंग प्रणाली पर सवालिया निशान खड़े  कर दिये हैं। करीब आठ लाख करोड़ रुपये की गैर निष्पादित सम्पत्तियों का सामना कर रहे पीएसयू सेक्टर के पंजाब नेशनल बैंक का यह घोटाला बहुत बड़ी  मुसीबत का संकेत दे रहा है। पब्लिक सेक्टर के बैंकों पर कारपोरेट को सरकारी प्रभाव के चलते बिना किसी ठोस गारंटी के तथा नियमों को अनाप-शनाप कर्ज देने के आरोप पहले से लगते रहे हैं। लाखों-करोड़ों   रुपये की गैर निष्पादित सम्पत्तियां इसी का परिणाम हैं। दस वर्ष पूर्व सत्यम घोटाले ने देश के अर्थ जगत में जैसे  सनसनी फैला दी थी और कारपोरेट प्रबंधन की पोल उजागर कर दी थी वैसे ही पंजाब नेशनल बैक का यह घोटाला देश के बैंकिंग तंत्र  को गहरा धक्का पहुंचा सकता है। यह गम्भीर चिंता का विषय है कि गैर निष्पादित सम्पत्तियों यानि कर्ज मे फंसे बैंकों को इस समस्या से निपटने का कोई ठोस समाधान अभी तक नहीं दिखायी पड़  रहा है। हालांकि केंद्र सरकार इस समस्या के लिए पिछली यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए समस्या से निपटने का सही तरीका अपनाने की बात कह रही है, लेकिन उसकी इस बात में कितना दम है और उसे समस्या से निपटने में कितनी कामयाबी मिली है, यह कहना अभी मुश्किल है।
पंजाब नेशनल बैंक ने खुद मुबई स्टाक एक्सचेंज को अपनी मुंबई शाखा के इस घोटाले की जानकारी दी है, जिसमें कहा गया है कि 11,330 करोड़ रुपये  का फर्जी लेन-देन किया गया। फर्जीवाड़ा  करके बैंक को चपत लगायी गयी यह रकम शेयर बाजार में बैंक के कुल बाजार पूंजीकरण की लगभग एक तिहाई है। इसके चलते शेयर बाजार में पंजाब नेशनल बैंक के शेयरों को लगभग दस प्रतिशत का नुकसान हुआ। एक तरफ दुनिया में भारत की छवि तेजी से तरक्की करने वाले देश के रूप में बन रही है, दूसरी तरफ हमारे देश के बैंकों द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों-करोड़ों रुपये कर्ज के रूप में कारपोरेट जगत के ऐसे लोगों को लुटा देने का कार्य, जो कि उसे वापस करने के बजाय हजम कर जाएं, उनके  लचर प्रबंधन की ओर संकेत करता है। सिर्फ यह सोचकर कि घोटाला उजागर हो गया, संतोष कर लेने से काम नहीं चलेगा। न ही इसके लिए पूर्ववर्ती सरकार को कोसने से समस्या हल होगी, क्योंकि कर्ज में डूबी यह रकम वापस हो पायेगी, यह मुश्किल ही लगता है। पहले माल्या, फिर नीरव मोदी द्वारा अरबों का घोटाला कर विदेश फरार हो जाने के पीछे बैंक प्रबंधन के उच्च अधिकारियों के साथ-साथ इन कारोबारियों का साथ देकर बैंक प्रबंधन पर दबाव डालने वाले राजनेता भी फर्जीवाड़ा की इन घटनाओं के लिए कम जिम्मेदार नहीं है।  एक तरफ फर्जीवाड़े की इन घटनाओं की जल्द से जल्द जांचकर दोषी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर सरकार और रिजर्व बैंक को चाहिए कि वह एनपीए और इस तरह के फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाने के लिए हमारे बैंकिग तंत्र को पूर्ण सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए सभी जरूरी कदम उठाये, ताकि फिर कोई माल्या या नीरव देशवासियों की गाढ़ी कमाई को चूना न लगा सके।
                                                                                                -राजेश अवस्थी 

आतंकियों के खिलाफ़ सिर्फ बातें नहीं, ठोस कार्रवाई की जरूरत

जम्मू स्थित सुंजवां आर्मी कैम्प पर आतंकवादियों द्वारा किया गया हमला और उसके बाद श्रीनगर के सीआरपीएफ कैम्प पर आतंकियों द्वारा हमले का प्रयास हमारी खुफिया एजेंसियों की निष्क्रियता का नतीजा र्हैं। एक तरफ सरकार हमेशा यह वादा करती है कि छावनियों, सैन्य संस्थानों तथा पाक सीमा से लगे ऐसे ठिकानों पर  कड़े सुरक्षा प्रबंध किये जायेंगे, लेकिन सरकार के ये वादे हमेशा खोखले साबित होते हैं। पिछले चार सालों के दौरान आतंकवादी 14 सैन्य ठिकानों पर हमला कर चुके हैं तथा इन हमलों के दौरान हमारे देश के लगभग चार दर्जन सैनिक शहीद हो चुके हैं। आतंकवादियों द्वारा बार.बार ऐसी घटनाओं को अंजाम देना जहां हमारी खुफिया एजेंसियों की विफलता की ओर संकेत करती है, वहीं इससे आतंकियों के हौसले बुलंद होते हैं। सुंजवां कैम्प पर हमले के बाद खुद आर्मी चीफ मौके पर गये। एनआईए और गरुड़ कमांडो भी आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई में जुटे। आतंकवादियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि अभी इस घटना को हुए दो दिन ही बीते थे कि सोमवार 11 फरवरी को  तड़के आतंकियों ने फिर श्रीनगर सीआरपीएफ कैम्प पर हमले की कोशिश की। यह बात दीगर है कि इस बार सैन्यकर्मियों की सर्तकता के कारण वे सफल नहीं हो पाये, लेकिन उनसे हुई मुठभेड़ के दौरान एक जवान शहीद हो गया। 
                         सवाल उठता है कि जब यह बात मालूम थी कि नौ फरवरी को आतंकी अफजल गुरु तथा 11 फरवरी को मकबूल बट की बरसी पर आतंकवादी किसी आतंकी घटना को जन्म दे सकते हैं तो क्यों नहीं इन सैन्य ठिकानों व सैनिकों के परिवारों के रिहायशी क्षेत्रों की सुरक्षा कड़ी  की गयी। क्यों नहीं विधानसभा में पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाने वाले विधायकों के खिलाफ अभी तक कार्रवाई की गयी। एक तरफ प्रधानमंत्री फलस्तीन, जार्डन और खाडी देशों में पाकिस्तान के विरुद्ध माहौल बना रहे थे, दूसरी ओर आतंकी एक के बाद एक घटनाओं को अंजाम देकर हमारा मखौल उडा रहे थे। सीमा पार से सैन्य ठिकानों पर आतंकी हमलों की सूची लगातार लम्बी होती जा रही है। हदवाडा, शोपियां, पुलवाड़ा , तंगधार, कुपवाड़ा , पंपोर, श्रीनगर, सोपौर, राजौरी, बड़गाम, उरी, पठानकोट के बाद अब सुंजवां में हुए आतंकी हमलों के दौरान हमने अपने सैनिकों के रूप में बड़ी  कीमत चुकाई है। दरअसल विकृत मानसिकता का शिकार पाकिस्तान हमारी सहिष्णुता का गलत लाभ उठाता रहा है। यहां दुर्भाग्य यह  है कि ऐसी जघन्य घटनाओं के लगातार घटने के बावजूद पाकिस्तान के साथ हमारे सेना नायक क्या सलूक अपनाएं, इस बारे में हमारे देश के नीति नियंताओं के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं है। पाक की हन बेजा हरकतों के प्रति हमारे नीति नियंताओं द्वारा कोई कड़ा  फैसला न लिये जाने तथा हमारी खुफिया एजेंसियों की नाकामी के दिन हमारे सैनिकों को आये दिन अपनी जान गंवानी पड़ रही है। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार को इन आतंकी हमलों को रोकने के लिए पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दे तथा एक बार फिर सर्जिकल स्टाइक करके आतंकवाद की जड़ों  को मिटाने के लिए सेना को आदेश दे। अब सरकार को कश्मीर सहित देश बे अन्य भागों में इन आतंकी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए कड़े  फैसले ले और हम पर हमला होने पर कार्रवाई की नीति अपनाने के बजाय हमलावर को पहले ही मिटा देने की रणनीति पर कार्य करे, ताकि आतंकी पनप न सकें। केन्द्र को अब यह मानकर चलना चाहिए कि उंगली टेढ़ी किये बिना घी निकलने वाला नहीं है।
                                                                                                                                                                           -राजेश अवस्थी 

...तो क्या अगले आम चुनाव में बन पायेगा मोदी का कोई विकल्प ?

  वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियों ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। केन्द्र सरकार से भाजपा के कुछ सहयोगी दलों की नाराजगी से कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को यह लगने लगा है कि अगली बार के चुनाव में जनता भाजपा को नकार देगी। इसलिए वे अभी से इसकी तैयारी में जुट गये हैं तथा नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में चेहरा पेश करने लगे हैं। कांग्रेस ने जहां राहुल गॉंधी को नरेन्द्र मोदी का विकल्प के रूप में पेश किया है, वहीं अन्य विपक्षी दल इससे सहमत नहीं दिखाई पड़ रहे हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव तथा उसके बाद भाजपा ने एक के बाद एक जीत से अपनी मजबूत धुरी बनाई थी। उसके सहयोगियों के बीच ऐसा मैसेज था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अपराजेय है और सहयोगियों की हैसियत भाजपा की वजह से है। इस वजह से  भाजपा की सहयोगी पार्टियां चुप रह कर सही समय का इंतजार कर रही थीं। हालांकि इन पार्टियों के नेता दबी जुबान में भाजपा के छोटे-बड़े नेताओं के अहंकार की शिकायत भी कर रहे थे पर शिवसेना के अलावा कोई खुल कर नहीं बोल रहा था। 
 
इसका एक कारण तो यह था कि राज्यों को केंद्र से कुछ मिलने की उम्मीद थी और दूसरे उनको यह लग रहा था कि भाजपा हिंदुत्व के वोटों की अधिकृत पार्टी है, मोदी उसके अधिकृत नेता हैं। इसलिए उनके खिलाफ बोलने से चुनावी नुकसान हो सकता है। पर अब तेजी से चीजें बदल रही हैं। 
 
गुजरात में भाजपा के अपने घोषित लक्ष्य से बहुत पीछे रह जाने और राजस्थान में उपचुनाव हार जाने के बाद सहयोगियों की जुबान खुल गई है। बजट के बहाने टीडीपी ने भाजपा पर निशाना साधा है। अकाली दल ने इसका समर्थन किया है तो नायडू ने शिवसेना को भी अपने साथ जोड़ा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पूर्वोत्तर की कई सहयोगी पार्टियों ने भी नाराजगी जाहिर कर दी है। भाजपा के सहयोगी दलों के बिखराव से कांग्रेसी नेताओं के चेहरे खिल गये हैं। सोनिया गॉंधी ने इसे देखते हुए भाजपा के खिलाफ एकजुटता के लिए नयी दिल्ली में विपक्षी पार्टियों की बैठक बुलाई। राहुल गॉंधी के कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद सहयोगियों ने अपनी अलग पोजिशनिंग शुरू की है। हालाँकि समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से तालमेल से इनकार किया है तो बसपा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गॉंधी की बुलाई बैठक का बहिष्कार किया। 
उधर एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने मुंबई में मोर्चा निकाला और दिल्ली में विपक्षी पार्टियों की बैठक बुलाई। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अलग तेवर दिखा रही हैं। दिल्ली में हुई विपक्षी पार्टियों की बैठक में ममता बनर्जी के प्रतिनिधि के रूप में डेरेक ो ब्रॉयन ने मोदी के विकल्प के रूप में राहुल गाँधी को पेश किये जाने पर ऐतराज जताते हुए कहा की मोदी के विकल्प के तौर पर कोई ऐसा नेता होना चाहिए, जिसके पास मुख्यमंत्री अथवा केंद्रीय मंत्री के रूप में काम करने का तज़ुर्बा हो। बैठक में  शामिल हुए लेफ्ट पार्टियां कांग्रेस से संबंधों को लेकर बहस कर रही हैं तो यूपीए का हिस्सा रहे डीएमके की ओर से बहुत स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहे हैं। 
सो, भाजपा को रोकने के लिए विपक्ष का एक महागठबंधन बनाने के प्रयास को धक्का लगा है। इन सबके बीच कांग्रेस ने ऐलान कर दिया है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प सिर्फ राहुल गांधी ही होंगे। इससे विपक्षी पार्टियों की खाई और बढ़ सकती है। 
असल में तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के मुखियाओं की महत्वाकांक्षा अचानक जग गई है। सब अपने को भाजपा का विकल्प मानने लगे हैं। उनको यह भी लगने लगा है कि अगले आम चुनाव में लोकसभा त्रिशंकु बन सकती है और 1996 जैसे हालात बन सकते हैं, जिसमें किसी की लॉटरी लग सकती है। 
क्षे़त्रीय पार्टियों के मुखियाओं को लग रहा है कि कांग्रेस की बजाय वे नरेंद्र मोदी को ज्यादा कड़ी टक्कर दे रहे हैं। तो दूसरी ओर गॉंधी परिवार और उसके सिपहसालारों को 2004 जैसे नतीजे दोहराए जाने की संभावना दिख रही है। सो, उसने राहुल गांधी के लिए पोजिशनिंग शुरू कर दी है। गॉंधी परिवार और उसके सिपहसालार इस बात से आहत हैं कि राजीव गांधी के बाद नेहरू गांधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री नहीं बना। राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटे हुए करीब 30 साल और दुनिया से गए हुए 27 साल हो गए। 
सो, कांग्रेस कोई मौका नहीं गंवाना चाहती है और न कोई जोखिम लेना चाहती है। बहरहाल,कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच चल रही इस खींचतान में यूपीए की धुरी प्रभावित हो रही है। वह कमजोर हो रही है। इससे इस बात को बल मिल रहा है कि यदि भाजपा अपने सहयोगियों को मनाने में सफल रही तो अगले लोकसभा चुनाव में वह फिर से केन्द्र की सत्ता हासिल कर सकती है।
                                                                                                                                                                                       -राजेश अवस्थी       

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर वीरांगनाओं का अपमान कब तक ?

फिल्म निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावत' को लेकर देश भर में चले बवाल के बाद अब कंगना रनौत की 'फिल्म: मणिकर्णिका द क्वीन ऑफ  झांसी' पर हंगामा शुरू हो गया है।  राजस्थान की ब्राह्मण महासभा ने फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई की छवि को धूमिल करने का आरोप लगाया है। इस विवाद की चिंगारी अब राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैलनी शुरू हो गयी हैं।
संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत को लेकर भी लम्बे समय तक विवाद चला तथा सेंसर बोर्ड से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को इसमें हस्तक्षेप करना पडा। आखिरकार फिल्म  के कई दृश्यों की कांट-छांट के बाद फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति मिली और अब देश विदेश में यह फिल्म प्रदर्शित की जा रही है। यहां यह गौरतलब है कि राजस्थान की करणी राजपूत सेना ने इस फिल्म में रानी पद्मावती  के अपमान का आरोप लगाया था। लम्बे समय तक विवादों के केंद्र में रही यह फिल्म लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बनी और आज हालत यह है कि यह फिल्म देश विदेश में अरबों का मुनाफा कमा रही है। अब भंसाली के नक्शे-कदम पर चलकर फिल्म निर्माता कमल जैन निर्देशक कृष के निर्देशन में 'मणिकर्णिका: द  क्वीन  ऑफ झांसी' बना रहे हैं। राजस्थान की ब्राहमण सभा ने आरोप लगाया है कि इस फिल्म  में ऐतिहासिक तथ्यों से छेडछाड की गयी है। उनका कहना है कि इस  फिल्म में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का एक अंग्रेज के साथ अफेयर दिखाया जा रहा है। महासभा के अध्यक्ष सुरेश मिश्रा का कहना है कि इतिहास की किसी भी पुस्तक में आज तक रानी लक्ष्मीबाई के किसी अंग्रेज से प्रेम संबंधों के बारे में जिक्र नहीं किया गया है। यह फिल्म निर्माता की दूषित सोच का परिणाम है। उन्होंने इस फिल्म की राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में की जा रही शूटिंग का कडा विरोध करते हुए सरकार को इस फिल्म की शूटिंग रोकने की चेतावनी दी है।
fफल्म पद्मावत को लेकर लंबा विवाद चला और अब फिल्म प्रदर्शित हो गई है। कई लोग उसका समर्थन भी कर रहे हैं कि इस फिल्म को  बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। बेशक फिल्म का प्रस्तुतीकरण  बेहतर है, क्योंकि फिल्म निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली इसमें माहिर हैं ।  सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों को को तोड-मरोडकर प्रस्तुत करते हुए किसी को फिल्म बनाने की आजादी कैसे दी जा सकती है, फिल्म मनोरंजन का माध्यम है और भारत में काल्पनिक कहानियों पर फिल्म बनाने की पूरी आजादी है तो फिर ऐतिहासिक घटनाओं पर फिल्म
क्यों ? 
यह आजादी जारी रहती है तो  फिल्मकार समय के साथ अपनी सोच के अनुरूप यदि फिल्में पेश करने की कोशिश करेंगे तो उन्हें कैसे रोकेंगे ? 
देशभर में फिल्म पद्मावत को लेकर चले विवाद के कारण  विरोध प्रदर्शन और हिंसा के चलते आमजन को भारी नुकसान हुआ। केन्द्र सरकार की इस बाबत खामोशी के कारण भाजपा राजस्थान में चुनाव हार गई।  इसके विपरीत फिल्म निर्माता संजय  लीला भंसाली फायदे में रहे ।
अब बड़ा प्रश्र है कि मणिकर्णिका द क्वीन ऑफ झांसी को लेकर भी क्या यही घटनाक्रम फिर से दोहराया जाएगा।
बीसवीं सदी में भारतीय सेंसर बोर्ड का गठन हुआ तब हालात कुछ और थे, चलचित्र प्रस्तुतीकरण के लिए फिल्म निर्माण ही एकमात्र माध्यम था और यह सबके लिए आसान नहीं था, लेकिन आज फिल्म निर्माण, दर्शन.प्रदर्शन के लिए हर हाथ में मोबाइल है। आज हालत यह है कि सेंसर बोर्ड की ए फिल्में तो छोडि़ए, असंख्य अश्लील  फिल्में मोबाइल में आसानी से उपलब्ध हैं और इन्हें देखनेवालों की संख्या करोड़ों में है ।
इसलिए जरूरत इस बात की है कि केन्द्र सरकार सेंसर बोर्ड के लिए नए दिशा.निर्देश जारी करे, नए क्षेत्रों में उसे अधिकार प्रदान करे, ताकि फिल्म निर्माण के जरिए किसी भी देश, समाज, धर्म, जाति,ए वर्ग के प्रति प्रत्यक्ष अपमान का जहर न फैलाया जा सके।
 
                                                                                                                                                                                                                                                  -राजेश अवस्थी

चले थे उन्हें बेनकाब करने, खुद ही बेपर्दा हो गए

 संसद में बुधवार को बजट सत्र में राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान कांग्रेस समेत विपक्षी सांसदों द्वारा किये गये हंगामे ने लोकतंत्र की गरिमा को एक बार फिर  तार-तार करने की कोशिश की है। दरअसल! केंद्र  की सत्ता पर लम्बे समय तक काबिज रही कांग्रेस पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली करारी हार से बुरी तरह तिलमिला उठी है तथा चार साल बीतने के बावजूद वह अभी तक इस सदमे से नहीं उबर पा रही है। यही कारण है वह अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए वह अभी से कमर कस रही है तथा भाजपा को नीचा दिखाने के लिए कोई भी मौका हाथ से नहीं देना चाहती है। भले ही इसके लिए संसद के अंदर से लेकर बाहर तक उसे कोई भी तरीका क्यों न अपनाना पडे। यही वजह  है कि पिछले चार साल में कांग्रेस ने अनेक बार संसद सत्र के दौरान हंगामा प्रदर्शन कर संसद सत्र को बाधित किया। 
            बुधवार को संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिये गये भाषण के दौरान कांग्रेसी सांसदों द्वारा यही प्रक्रिया एक बार फिर दोहरायी गयीं। दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गॉंधी इस समय रॉफेल विमान समझौते को लेकर केन्द्र सरकार पर हमलावर हैं तथा प्रधानमंत्री पर आरोप लगा रहे हैं। बुधवार को संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान विपक्ष के नेता नारे लगाकर केंद्र सरकार पर हमला बोलते रहे। संसद का माहौल देखकर ऐसा लगता था कि पार्टी नेतृत्व की तरफ से कांग्रेसी सांसदों को इस सम्बंध में खास तौर पर निर्देश दिये गये थे कि हंगामा प्रदर्शन करके प्रधानमंत्री को बोलने नहीं देना है। शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान लगातार हंगामा चलता रहा हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक मंझे हुए राजनेता हैं और उन्हें इस तरह के हंगामों से निपटना अच्छी तरह आता है। यही कारण है कि विपक्ष के प्रहारों से विचलित हुए बिना कांग्रेस द्वारा पिछले चार साल के दौरान लगाये गये तमाम आरोपों का जवाब उन्होंने अपने विशेष अदाज में  शालीनता के साथ दिया। कांग्रेस को लग रहा था कि रॉफेल सौदे को लेकर केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा  कर देंगे तथा सरकार घिर जायेगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा।
             प्रधानमंत्री ने रॉफेल सौदे पर कुछ कहने के बजाय अपने भाषण के जरिये यह संदेश देने की कोशिश की कि कांग्रेस को ऐसे अनेक मुद्दे उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कांग्रेस शासनकाल के घोटालों, कार्य योजनाओं को आधा-अधूरा छोड़  देने आदि पर विस्तृत चर्चा की। साथ ही अपनी सरकार की उपलब्धियॉं गिनायीं। यह साबित किया कि देश के विकास के मामले में कांग्रेस इस सरकार से बहुत पीछे थी। अनेक विषयों में तो इस सरकार की गति कांग्रेस के मुकाबले दोगुनी रही है।
             पिछले चार वर्षों के दौरान कांग्रेस द्वारा कई बार लगाये गये आरोपों के दौरान मौन धारण करने वाले प्रधाननंत्री श्री मोदी ने इस बार अपने विशेष अंदाज में कांग्रेस के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब देते हुए उसे ही कठघरे में खड़ा  कर दिया। यह बात दीगर है कि प्रधानमंत्री ने रॉफेल सौदे को लेकर राहुल गॉंधी द्वारा लगाये गये आरोपों का जवाब नहीं दिया। इस बारे में शायद उनका विचार रहा होगा कि रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ही इसका जवाब देने के लिए काफी हैं। उनका यह सोचना काफी हद तक सही भी था। सेना की तरफ से यह बताया गया कि इस मामले में कुछ भी गलत नहीं हुआ। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण भी  रॉफेल सौदे को को लेकर लबयन दे चुकी हैं। जहॉं तक इस समझौते को सार्वजनिक किये जाने का सवाल है तो इस मामले में पिछली सरकार द्वारा की गयी व्यवस्था ही लागू है। कांग्रेस के नये-नये अध्यक्ष बने राहुल गॉंधी शायद यह भूल गये हैं कि उनकी ही पार्टी की अगुवाई में बनी यूपीए सरकार के रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने भी देश की सुरक्षा का हवाला देते हुए रक्षा सौदे की जानकारी देने से इंकार कर दिया था। यही नहीं पूर्व राष्ट्रपति तथा तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी भी कह चुके हैं कि  किसी डिफेंस डील के बारे में सदन में चर्चा करना सही नहीं होगा। डील की गोपनीयता को बनाए रखना जरूरी होता है। ऐसे में बेहतर तो यही होता कि राहुल गॉंधी इस विषय को लेकर कोई सवाल न करते। जिनके खुद के घर शीशे के हों उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए, अन्यथा खुद के चोटिल होने की प्रबल आशंका रहती है। यह बात शायद राहुल गॉंधी को अभी तक नहीं समझ में आयी है।
          बहरहाल प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने अपने भाषण के दौरान यूपीए सरकार की नाकामियों का जिक्र करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि यूपीए सरकार अपने दस साल के शासन के दौरान देश का विकास करने के बजाय घोटालों धांधलियों को प्रश्रय देती रही और अब एनडीए सरकार की नीतियों को बाधित कर तथा सरकार पर झूठे आरोप लगाकर जनता को भ्रमित करके देश के विकास में बाधा पहुँचाने  का कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि डोकलाम विवाद के दौरान राहुल गॉंधी का चीनियों के साथ बातचीत करना गलत था। इससे विदेशों में भारत के प्रति गलत संदेश प्रसारित हुआ। विदेशी लोगों ने सोचा होगा कि भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में भी मतभेद है। बुधवार को संसद में प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये भाषण के दौरान विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस के प्रति प्रधानमंत्री के तीखे तेवरों से यह साफ हो गया कि अगर विपक्षी दल अनावश्यक आक्रामकता का परिचय देंगे तो उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब मिलेगा।
 
                                                                                                                                                                                                                                                       -राजेश अवस्थी