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खेल दिवस की सार्थकता

हर वर्ष की भांति आज भी यानि 29 अगस्त को देश भर में हाकी के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी मेजर ध्यान चंद की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए खेल दिवस मनाया जा रहा है। मेजर ध्यानचंद को हाकी का जादूगर कहा जाता है। उनकी नजर अर्जुन की भांति हमेशा अपने लक्ष्य पर ही टिकी रहती थी और यही कारण था कि यदि गेंद उनकी स्टिक से टकरा गई तो वह सीधे गोल करके ही लौटती थी। उनकी अगुवाई में भारतीय हाकी टीम  लगातार तीन बार ओलम्पिक में विजेता बनी थी। मेजर ध्यानचंद सिर्फ एक खिलाड़ी ही नहीं थे, उनमें देश प्रेम भी कूट-कूटकर भरा हुआ था। उन्हें विदेशों से भी खेलने के लिए तमाम आफर मिले, लेकिन उन्होंने अपनी मातृभूमि को छोड़कर किसी अन्य देश के लिए खेलना गवारा नहीं किया। ऐसे महान देशभक्त के देश में खेलों के क्षेत्र में अन्य देशों की तुलना में गिरावट दिखायी पड़े तो यह देश के नीति निर्धारकों के लिए सचमुच विचारणीय विषय है।
 ऐसा नहीं है कि  वर्तमान समय में देश की मिट्टी में खिलाड़ियों की पौध नहीं उग रही है, बल्कि हकीकत यह है कि उस पौध को सही खाद तथा अन्य पोषक तत्व नहीं मिल रहे हैं। इसका उदाहरण है सिडनी में सम्पन्न हुए कॉमन वेल्थ गेम्स 2018 में महिला भारोत्तोलन में स्वर्ण पदक हासिल करने वाली पूनम यादव। वाराणसी के एक किसान परिवार में पैदा हुई पूनम को खेल के क्षेत्र में मुकाम हासिल करने के लिए उनके पिता को अपनी भैंस तक बेचनी पड़ी थी। यही नहीं, ,इससे पूर्व जब सन् 2018 में ग्लासगो में संपन्न कामन वेल्थ गेम्स में पूनम ने कांस्य पदक हासिल किया था, तब लोगों को मिठाइयां खिलाने के लिए उनके परिवारजनों के पास पैसे तक नहीं थे।
यही नहीं, अभी हाल ही एशियन गेम्स में शूटिंग में स्वर्ण पदक हासिल करने वाले  मेरठ के कलीना गांव के होनहार शूटर सौरभ ने जिस पिस्टल से निशाना साधकर देश को गौरव दिलाया था, वह उनके पिता ने दो साल पूर्व बैंक से कर्ज लेकर खरीदी थी। इस कर्ज की किश्तें उन्हें अभी भी बैंक को चुकानी हैं।
         हमारे देश में नीति निर्धारकों की नजर खेल जगत की नई पौध पर नहीं पड़ती, बल्कि जब वह विदेशी धरती पर जब कोई मुकाम हासिल कर लेता है यानि कोई स्वर्ण या रजत पदक हासिल कर देश को गौरव दिला देता है, उस समय देश व प्रदेश की सरकारें उसके लिए इनाम स्वरूप हजारों की धनराशि की घोषणा करना अपना फर्ज समझती हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आता है, जिस समय देश को गौरव दिलाने के लिए खेल जगत की नयी प्रतिभाएं कठिनाइयों से जूझकर आने बढ़ने का प्रयास कर रहे हों, उस समय आर्थिक रूप से तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप मदद करके उनका सहारा बनें। हमारे देश के विपरीत विश्व की महाशक्ति अमेरिका  व चीन में खिलाड़ियों की नयी पौध तैयार करने के लिए वहां की नीतियां उतनी ही गम्भीर हैं, जितनी कि शिक्षा तथा अन्य क्षे़त्रों में। यही कारण है कि इन देशों में हर वर्ष खेल के क्षे़त्र में उत्कृष्ट खिलाड़ी निकल कर सामने आते हैं, जबकि हमारे देश में खेल के क्षेत्र में स्थितियां बिल्कुल विपरीत है।
कहना न होगा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी नीतियां निर्धारित की जायं, जिनसे खेलों को सम्मानित दर्जा हासिल हो सके। खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने तथा खिलाड़ियों की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें सुचिधाएं उपलब्ध कराये जाने की भी महती आवश्यकता है। जिस तरह शिक्षा तथा विज्ञान के क्षेत्र में शोधार्थियों को आर्थिक मदद व छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है, उसी तरह खेल के क्षेत्र में भी लगन से काम करने वाले तथा आगे बढ़ने का प्रयास करने वाले खिलाड़ियों को स्टाइपेंड देकर उनकी आर्थिक मदद करनी होगी, तभी खेल दिवस की सार्थकता और हाकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद को सच्ची श्रद्धांजलि मिलेगी।  
                                                        -राजेश अवस्थी                                                                      

विपक्ष की आलोचना से घिरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पलटवार

पिछले काफी समय से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत विभिन्न विपक्षी दलों खास तौर पर वामपंथी दलों के नेताओं की आलोचना झेल रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब इसका सटीक जवाब देने की ठान ली है तथा उन पर पलटवार करते हुए उन्हें संघ के कार्यक्रम में अपनी बात रखने का न्योता देने का मन बना लिया है। अब विदेशी धरती पर संघ की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड नामक आतंकी संगठन से करने वाले कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी को आमंत्रित करने का निर्णय लेकर संघ की मंशा उन्हें चारों तरफ से घेरने की है । यदि राहुल गांधी संघ के कार्यक्रम में नहीं जाते हैं तो संसद में उनके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ गलबहियां करके नफरत मिटाने के बयान को दिखावा कहकर प्रचारित किया जा सकता है। इसके विपरीत यदि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में चले गये तो उन पर संघ के कार्यक्रम में जाने का ठप्पा लग जाएगा, जिसे राहुल गांधी पूरी तरह अछूत मानते रहे हैं। 
यहां यह भी विचारणीय है कि हमेशा बिना किसी ठोस आधार के बात करने वाले राहुल यदि संघ के कार्यक्रम में जाकर उसकी आलोचना करते हैं तो उन्हें इसके लिए ठोस तथ्यों के साथ पूरी तैयारी करके जाना होगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे तथा पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी कुछ माह पूर्व संघ के एक कार्यक्रम में शामिल होकर उसके संस्थापक हेडगेवार को देश का महान सपूत बता चुके हैं। सिर्फ यही नहीं, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और यहां तक कि राहुल गांधी के पिता व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी संघ के कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। इनके अतिरिक्त देश की आजादी की लड़ाई के नायक सुभाष चंद बोस समेत विभिन्न कांग्रेसी नेता भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जा चुके हैं। ऐसी स्थिति में यदि राहुल गांधी संघ के कार्यक्रम में जाने से परहेज बरतते हैं तो देखना होगा कि वे इसके लिए किस तर्क का सहारा लेते हैं। 
दरअसल कांग्रेस की कमान जब से सोनिया गांधी और राहुल गांधी के हाथ में आई है,  तब से पार्टी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति एक अलग तरह का माहौल कायम करने का प्रयास किया गया। सोनिया और राहुल ने कांग्रेस की बागडोर हाथ में लेने के बाद से लगातार संघ पर प्रहार करना शुरू कर दिया। उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए भी संघ को जिम्मेदार ठहराया और इसके लिए वे अभी भी कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। खबर मिली है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आगामी 17 सितम्बर से 19 सितम्बर तक  तीन दिवसीय कार्यक्रम में राहुल गांधी समेत विभिन्न विपक्षी दलों के दिग्गजों को आमंत्रित करने का फैसला किया है। इस कार्यक्रम में आमंत्रित नेताओं को संघ के प्रति अपनी विचारधारा को प्रकट करने  के साथ-साथ संघ की विचारधारा तथा उसके बारे में नजदीक से जानने का मौका मिलेगा।
ऐसे में अब सभी की निगाहें संघ द्वारा कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी को उक्त कार्यक्रम का आमंत्रण दिये जाने तथा राहुल गांधी द्वारा इस निमंत्रण को स्वीकार करने अथवा ठुकराने पर लगी हुई हैं।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणव  मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में शामिल होने पर तो कांग्रेस के अनेक नेताओं ने उन पर तंज कसे थे। अब क्या वे राहुल गांधी के संघ के कार्यक्रम में जाने पर उन पर भी शब्दबाण चला पाएंगे। इसके विपरीत अगर राहुल गांधी संघ के निमंत्रण को ठुकराते हैं तो वे किस प्रकार कहेंगे कि वे नफरत को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं।
                                                                     -राजेश अवस्थी

फिर शुरू हुई गठबंधन की सियासत

2019 के लोकसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे एक बार फिर राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन की सियासत प्रारम्भ हो गयी है। कई पुराने गठबंधन जहां बिखराव के कगार पर हैं, वहीं विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा भाजपा को शिकस्त देने के लिए पंचमेल खिचड़ी तैयार की जा रही है। इसी क्रम में अभी हाल में पटना में एक कार्यक्रम के दौरान  राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष तथा केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि यदि यदुवंशियों का दूध और कुशवंशियों का चावल मिल जाए तो खीर बन सकती है। खीर के लिए छोटी जाति और दबे कुचले समाज का पंचमेवा भी चाहिए। उसके बाद जो स्वादिष्ट खीर तैयार होगी, वही सही मायनों में सामाजिक न्याय की परिभाषा है।
 उपेन्द्र कुशवाहा के इस बयान से राजनीतिक हल्कों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। कहा जा रहा है कि वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानि एनडीए से नाता तोड़ सकते हैं। कुशवाहा का यह बयान एनडीए पर दबाव बनाने की सियासत भी हो सकती है। यह भी चर्चा है कि उपेन्द्र कुशवाहा पिछले काफी समय से एनडीए से नाराज चल रहे हैं तथा कई बार वे केंद्र की मोदी सरकार के विरुद्ध बयानबाजी कर अपने गुस्से का इजहार कर चुके हैं। जब से राजग में नीतीश की वापसी हुई है, उपेन्द्र के तेवर बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की किन्तु उपेन्द्र को नजरअंदाज किया, जिससे उनका गुस्सा बढ़ गया। वे रमजान में दी गई रोजा अफ्तार पार्टी में भी नहीं आए।
दरअसल बिहार में एनडीए में शामिल दलों में भाजपा और जनता दल यू के अलावा राम विलास पासवान की लोजपा के अलावा कुशवाहा की रालोसपा भी है। कुल 40 लोकसभा सीटें हैं। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 22, लोजपा को छह, रालोसपा को तीन तथा जद यू को दो सीटें हासिल हुई थीं। जनता दल यू ने खुद को भाजपा का बड़ा भाई बताया तथा आने वाले लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें देने की मांग की। इससे कुशवाहा का गुस्सा भड़क उठा था। उन्होंने इस पर आपत्ति व्यक्त  करते हुए कहा कि बिहार में उन्हें जदयू से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए, क्योंकि राज्य में पिछले चार साल में उनकी पार्टी का जनाधार बढ़ा है। 
इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि बिहार में सींटों के बंटवारे का समीकरण बनाना अत्यंत चुनौती भरा काम है। जिस वर्ग के वोटों पर कुशवाहा का प्रभाव है, उसी वर्ग का प्रतिनिधित्व जनता दल यू के नेता भी करते हैं। ऐसी स्थिति में कुशवाहा के गठबंधन से बाहर जाने पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। उधर लालू का राष्ट्रीय जनता दल यदि उपेंद्र को ज्यादा सीटें देने वादा करता है तो स्वाभाविक है कि वे राजद से किनारा कर लेंगे। हालांकि क्रिकेट और राजनीति में आखिरी वक्त तक बाजी पलट सकती है और गठबंधन में नया बदलाव सम्भव हो सकता है। ऐसे में चुनाव में जीत-हार तो मतदाता की दूरदृष्टि पर निर्भर करती है।
                                                              -राजेश अवस्थी

प्लास्टिक हटाओ जीवन बचाओ...

शुरुआत, बोतल में बंद मिनरल वाटर से करते है| आज मिनरल वाटर पीना लोगों की दिनचर्या में शामिल है पर क्या आप जानते है जिस पानी को मिनरल वाटर कहकर लोग पानी पीते है उस पानी में प्रति लीटर 325 सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते है| फ्रेडोनिया यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयोर्क के वैज्ञानिक अध्ययन में ये बात सामने आई है| ये अध्ययन 9 देशों में किया गया जिसमे 259 बोतलों पर अध्ययन के बाद ये बात सामने आई है| आपको जानकर हैरानी होगी कि, विश्व भर में पानी के साथ लोग प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पीने को मजबूर है| क्योंकि ये पानी घर के नलों में से आता है| जानकारों द्वारा मिली, साल 2017 की रिपोर्ट के अनुसार 5 महाद्वीपों में से 12 देशों के पानी के नमूने जिस वक्त लिए गए तो तकरीबन 83% पानी के नमूनों ने प्लास्टिक के कण मौजूद मिले| पर इस प्लास्टिक प्रदूषण के लिए हम ही लोग जिम्मेदार है, जिस कारण प्लास्टिक हमारे शरीरों तक प्रवेश कर चूका है| प्रतिदिन समुन्द्र में प्लास्टिक का इस्तेमाल इसी प्रकार करते रहे तो साल 2050 तक मछलियों से कही ज्यादा प्लास्टिक कचरा समुंद्र में नजर आएगा| इसे यदि अभी नहीं रोका गया तो आने वाले समय में परिणाम अति विनाशकारी होंगे| अब इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते है कि 267 तरह तरह की प्रजातियां, (जीव-जंतु ) प्लास्टिक खा रही है उन्हें तो समझ नहीं है पर हम तो प्लास्टिक के दुष्परिणामों से अवगत है| इसीलिए नीदरलैंड ने अपने देश के सभी समुद्रों की सफाई करवानी शुरू कर दी है| आयरलैंड में साल 2002 में प्लास्टिक बैग पर टैक्स लगाया गया और सख्त निर्देश दिए गये कि यदि प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल किया तो टैक्स काफी ज्यादा देना होगा इस योजना के चलते आयरलैंड में 94% प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल में गिरावट दर्ज की गयी| प्लास्टिक के इस्तेमाल में भारत 5वा बड़ा उपभोक्ता देश है| अमेरिका में हर साल एक औसत व्यक्ति 109 किग्रा. प्लास्टिक का प्रयोग करता है| देश में प्लास्टिक कानून की बात की जाएं तो दुकानदार केवल 50 माइक्रोन से काम वाला प्लास्टिक प्रयोग में नहीं ला सकते है यानि ये दूसरे प्रकार के प्लास्टिक बैग पर लागू होता ही नहीं         
है जो बाजार में अभी भी उपलब्ध है| मोटा माइक्रोन प्लास्टिक बैग बाजार में उपलब्ध है मतलब ये कि इससे प्लास्टिक पर कोई खास रोकथाम नहीं होती है| आवश्यक्ता अविष्कार कि जननी है तो इसी के मद्देनजर अमेरिका और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने पीईटी नाम का एक एंजाइम बनाया है पॉलीइथाइलीन 
टेरेपथेलेट प्लास्टिक में परिवर्तन करके उसे उसके मूल घटक में आता है जिससे प्लास्टिक की बोतलों को ( जो यूज की नहीं रही है ) दुबारा से परिवर्तित करके ( रिसाइकिलमेंट ) नई व उच्चगुणवत्ता वाली बोतलें तैयार हो सकेगी| इसी से प्लास्टिक के उत्पादन में बड़ी मात्रा में कमी आएगी| जनता का मानना है कि प्लास्टिक पर पूर्णरूप से रोक लगनी चाहिए जनमत के सर्वे के अनुसार 85% जनता प्लास्टिक पर रोक चाहती है और 94% जनता दिनचर्या में प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से खासा चिंतित है| पर कदम जनता को ही उठाना होगा| देश का काफी हिस्सा प्लास्टिक के द्वारा होने वाली परेशानियो व हानियों से अनभिज्ञ है| अतः जो इसके उपयोग व दुरूपयोग के विषय में सविस्तार जानकारी रखते है उन्हें दुसरो को ( इससे होने वाली हानियों के विषय में ) जागरूक करना चाहिए और हर एक को स्वम इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए ताकी भविष्य सुरक्षित बना रहे| प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल से जो खतरे होते है उसके प्रति आगाह करने के लिए 22 अप्रैल को 'पृथ्वी दिवस' घोषित किया गया और इस वर्ष इसकी थीम रखी गयी " प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करो ".
 
                                                      निधि भड़ाना 

कांग्रेस का आत्मघाती कदम

पिछले कई दिनों से पूरे देश में इस बात की जोर-शोर से चर्चा हो रही थी कि कुछ विपक्षी दलों ने कांग्रेस की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का जो नोटिस राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को दिया है, इस नोटिस का क्या अंजाम होता है? यह बात तो शुरू से साफ थी कि यह एक तरह से अधकचरी और बचकाना हरकत है। राज्यसभा के 64 सदस्यों ने इस महाभियोग प्रस्ताव पर दस्तखत किए थे। परन्तु इसके पारित होने के लिये राज्यसभा के दो-तिहाई सदस्यों की सहमति जरूरी थी। विपक्षी दलों को राज्यसभा में इतना बहुमत प्राप्त नहीं था और मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग को लोकसभा में पारित करना तो असंभव ही था। इस तरह से यह स्पष्ट हो गया था कि हड़बड़ी में लाया गया महाभियोग का प्रस्ताव किसी भी हालत में सफल नहीं होगा। सबसे दिलचस्प बात तो यह थी कि कांग्रेस ने महाभियोग लाने का फैसला किया था, परन्तु उसके दो वरिष्ठ सदस्य पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस प्रस्ताव पर दस्तखत करने से साफ इंकार कर दिया था। इतना ही नहीं कांग्रेसी नेता और  पूर्व कानून मंत्री अश्वनी कुमार और सलमान खुर्शीद भी इसके विरोध में थे, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि इसका परिणाम क्या होने वाला है। इसलिए वे किसी भी हालत में अपनी किरकिरी नहीं करवाना चाहते थे। इसके बावजूद कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी ने पार्टी के कुछ सांसदों की सलाह पर इस प्रस्ताव को पेष करवाने का निर्णय लिया। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस प्रस्ताव को खारिज करने से पहले देश के नामी-गिरामी न्यायविदों से सलाह मशविरा किया और सभी ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि यह प्रस्ताव बिलकुल बेमानी है और राजनीतिक स्वार्थ के कारण महज सस्ते प्रचार के लिए लाया गया है। ने न्यायविदों के अलावा पूर्व एटार्नी जनरलों और संविधान विशेषज्ञों के विचारों को भी पढ़ा। फिर वे इस नतीजे पर पहुंचे कि इस प्रस्ताव को खारिज करने अलावा और कोई चारा नहीं है। जिस दिन यह महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति को सौंपा गया उसी दिन से मीडिया में प्रमुख संविधान विशेषज्ञों की राय आनी शुरू हो गई। संविधान और कानून के विशेषज्ञों ने राय जाहिर की कि यह एकदम बेमानी है, अधकचरा और बचकाना हरकत है जिसका कोई मतलब नहीं। पूर्व एटार्नी जनरल सोली सारोबजी ने कहा कि सभापति वेंकैया नायडू ने गुण-दोष के आधार पर इस नोटिस को नामंजूर कर दिया है और फैसला लेने के पहले कानूनविदों से विस्तारपूर्वक विचार विमर्श किया है। अतः उनका निर्णय शत-प्रतिशत उचित है। उसी तरह प्रसिद्व विधिवेता फली एस नरिमन ने कहा कि राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने जो फैसला लिया है वह सर्वथा उचित है। संविधान के अनुसार इस विषय में फैसला लेने का अधिकार उन्हीं हो है और उनकी राय में वेंकैया नायडू ने सही निर्णय लिया जब से महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को भेजा गया टीवी के विभिन्न चैनलों पर बहस जारी थी और अनेक संविधान विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि यह स्वार्थ में उठाया गया कदम है और इस प्रस्ताव को उपराष्ट्पति को तुरन्त खारिज कर देना चाहिए। अंत में हुआ भी यही। उपराष्ट्रपति ने गहन विचार विमर्श के बाद और आरोप के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह फैसला किया कि महाभियोग का आरोप पूर्णतः निराधार और असंवैधानिक हैं। अतः उसे खारिज ही कर देना चिहए। उपराष्ट्रपति के इस निर्णय की देश के सभी संविधान विशेषज्ञों ने सराहना की और यह भी कहा कि भविष्य मे ंकिसी भी राजनीतिक दल को ऐसा नहीं करना चिहए। क्योंकि इससे न केवल देश के सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा पर आंच पहुंचती है बल्कि इससे पूरे देश की छवि विदेशों में धूमिल होती है। सच कहा जाए तो विपक्षी दलों ने चीफ जस्टिस  के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव का नोटिस लाकर अपनी पूरी तरह किरकिरी करा ली है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इतनी किरकिरी होने के बावजूद कांग्रेस सुप्रीमो इससे कोई सबक नहीं ले रहे हैं। उल्टे अपनी और किरकिरी कराने में तुले हैं।  हालात यह है कि 
अब उपराष्ट्रपति  द्वारा प्रस्ताव खारिज किए जाने से बौखलाए कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाएंगे। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट भी इस तरह के प्रस्ताव को तुरन्त खारिज कर देगा। प्रसिद्व कानूनविद रामजेठमलानी ने कहा है कि यह पूर्णतः बचकानी हरकत थी और ऐसे प्रस्ताव को शुरू में ही कूड़ेदान में डाल देना चाहिए था। कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि महज ओछी पब्लिसिटी के लिये कांग्रेस समेत कुछ राजनीतिक दलों ने फालतू में अपना बेड़ा ही गर्क कर लिया। इसे कांग्रेस का आत्मघाती कदम ही कहा जाएगा कि देश का मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद आज उसके गिने-चुने सांसद हैं। इसके बावजूद उसके नेता बचकानी हरकतें करके पार्टी की रही-सही छवि भी मिटाने में तुले हुए हैं।
                                                                                                                                                 -राजेश अवस्थी